वन अनुसंधान केंद्र के अध्ययन में किंग कोबरा के व्यवहार, प्राकृतिक आवास और संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए, रिपोर्ट- राकेश रावत
नैनीताल: उत्तराखंड के नैनीताल के जंगलों में किंग कोबरा की दुनिया जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही हैरान करने वाली भी. समुद्र तल से 2300 मीटर की ऊंचाई पर इसका घोंसला मिलना वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड माना गया है. यहां मादा किंग कोबरा चीड़ और बांज की पत्तियों से ऐसा घोंसला तैयार करती है, जो बारिश के बीच भी अंडों को सुरक्षित रखने और उनके लिए अनुकूल तापमान बनाए रखने में मदद करता है.
एफटीआई ने किया किंग कोबरा पर अध्ययन: खास बात यह है कि अंडों की रखवाली के दौरान मादा करीब दो महीने तक भोजन किए बिना घोंसले में डटी रहती है. वन अनुसंधान केंद्र के अध्ययन में किंग कोबरा के व्यवहार, उसके प्राकृतिक आवास और संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं.
नैनीताल बना किंग कोबरा का खास ठिकाना: उत्तराखंड में किंग कोबरा की मौजूदगी को समझने के लिए वर्ष 2021 में अनुसंधान सलाहकार समिति के स्तर पर इसके विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया गया. सामने आया कि प्रदेश में किंग कोबरा की सबसे अधिक मौजूदगी नैनीताल वन प्रभाग की भवाली और मनोरा रेंज में दर्ज की गई. इसके अलावा देहरादून और पौड़ी समेत अन्य जिलों में भी इसकी मौजूदगी सामने आई है.
केरल, कर्नाटक के साथ उत्तराखंड में भी किंग कोबरा: आमतौर पर किंग कोबरा को दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट के वर्षावनों से जोड़कर देखा जाता है. केरल और कर्नाटक सहित दक्षिण भारत के कई इलाकों में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है. लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी जंगलों में इसकी मौजूदगी ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है. मुक्तेश्वर में समुद्र तल से करीब 2300 मीटर की ऊंचाई पर किंग कोबरा का घोंसला मिलना विशेष महत्व रखता है. इसे दुनिया में इतनी ऊंचाई पर किंग कोबरा के घोंसले की दर्ज मौजूदगी का रिकॉर्ड माना गया है.
मादा किंग कोबरा की अनोखी ममता: किंग कोबरा की दुनिया का सबसे दिलचस्प पहलू है मादा का मातृत्व. प्रजनन के दौरान मादा किंग कोबरा जून से अगस्त के बीच घोंसला तैयार करती है. शोध के मुताबिक, इसके घोंसले में चीड़ और बांज की पत्तियों का इस्तेमाल होता है. मादा अपने शरीर की मदद से पत्तियों को व्यवस्थित कर गुंबदनुमा संरचना बनाती है. यह प्राकृतिक इंजीनियरिंग का ऐसा उदाहरण है, जो अंडों को सुरक्षित रखने और उनके आसपास अनुकूल तापमान बनाए रखने में मदद करता है.
दो महीने भूखे-प्यासे रहकर अंडों की रक्षा करती है मादा किंग कोबरा: अंडे देने के बाद मादा करीब दो महीने तक उनकी रखवाली करती है. इस दौरान लंबे समय तक भोजन नहीं करती. मच्छरों और दूसरे जीव-जंतुओं के हमलों के बावजूद वह घोंसले की सुरक्षा में डटी रहती है. लगातार घोंसले के आसपास रहने और प्रजनन के दौरान होने वाले शारीरिक बदलावों के कारण उसके शरीर का रंग भी गहरा दिखाई दे सकता है. बारिश के मौसम में भी घोंसले की संरचना अंडों को सुरक्षा देने में मदद करती है. प्रकृति में मातृत्व और जीवित रहने की जद्दोजहद का यह एक अनोखा उदाहरण है.
सांपों का शिकारी, पारिस्थितिकी का रखवाला: किंग कोबरा सिर्फ अपने आकार और विष के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी भोजन संबंधी आदतों के लिए भी खास है. इसका प्रमुख आहार दूसरे सांप हैं. इनमें रैट स्नेक जैसे सांप भी शामिल हो सकते हैं. दूसरे सांपों का शिकार करके किंग कोबरा प्राकृतिक पारिस्थितिकी में उनकी आबादी को संतुलित रखने में भूमिका निभाता है. इसी वजह से किंग कोबरा को केवल खतरनाक जीव के तौर पर देखना सही नहीं है.
बहुत घातक होता है किंग कोबरा का विष: यह जंगल के खाद्य-जाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है. हालांकि, इसका विष बेहद घातक हो सकता है और इसे छेड़ना या पकड़ने की कोशिश करना जानलेवा साबित हो सकता है. इसलिए इसकी मौजूदगी वाले क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करना और सांप दिखने पर वन विभाग की मदद लेना बेहद जरूरी है.
सड़कें बन रहीं जिंदगी के लिए खतरा: इस दुर्लभ सांप के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब इंसानी गतिविधियां बनती नजर आ रही हैं. वर्ष 2022 से 2024 के बीच पांच किंग कोबरा की वाहनों से कुचलकर मौत हो गई. यह आंकड़ा वन्यजीव संरक्षण के सामने एक अहम सवाल खड़ा करता है कि जिन जंगलों में यह सांप सुरक्षित रह सकता है, वहां सड़क यातायात उसके अस्तित्व के लिए खतरा क्यों बन रहा है? ऐसे क्षेत्रों में वन्यजीवों की आवाजाही वाले संवेदनशील मार्गों की पहचान और वाहन चालकों को जागरूक करना संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है.
26 साल में किसी को नहीं काटने का दावा: एफटीआई (Forest Training Institute) निदेशक संजीव चतुर्वेदी के अनुसार-
किंग कोबरा के व्यवहार और मनुष्यों के साथ उसके संबंधों को समझना जरूरी है. उपलब्ध जानकारी में यह दावा भी सामने आया है कि 26 वर्षों में किंग कोबरा के किसी व्यक्ति को काटने की घटना दर्ज नहीं हुई. किंग कोबरा सामान्य तौर पर मनुष्यों से दूरी बनाए रखने वाला वन्यजीव है. खतरा महसूस होने पर वह रक्षात्मक व्यवहार कर सकता है. इसलिए इसे पूरी तरह हानिरहित या पालतू स्वभाव का जीव मानना गलत होगा.
-संजीव चतुर्वेदी, निदेशक, एफटीआई-
संजीव चतुर्वेदी कहते हैं कि जंगलों में इसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना और सड़क यातायात के दौरान वन्यजीवों की आवाजाही का ध्यान रखना संरक्षण की अहम जरूरत है.
पश्चिमी घाट से अलग है उत्तराखंड का किंग कोबरा: उत्तराखंड में पाए जाने वाले किंग कोबरा और पश्चिमी घाट में मौजूद किंग कोबरा के बीच भी महत्वपूर्ण अंतर सामने आए हैं. उपलब्ध शोध विवरण के अनुसार, पश्चिमी घाट के किंग कोबरा की लंबाई 12 से 14 फीट तक बताई गई है. उत्तराखंड में इनकी औसत लंबाई करीब 10 से 12 फीट दर्ज की गई. दोनों क्षेत्रों में पाए जाने वाले किंग कोबरा के डीएनए में भी अंतर सामने आया है. इससे इनके आनुवंशिक संबंधों, विकास क्रम और अलग-अलग पर्यावरण में अनुकूलन को लेकर आगे शोध की संभावनाएं बनती हैं.
किंग कोबरा को संरक्षण की जरूरत: नैनीताल के जंगलों में किंग कोबरा की मौजूदगी प्रकृति के उस अद्भुत संसार की झलक है, जहां एक तरफ मादा अपने अंडों की सुरक्षा के लिए महीनों तक संघर्ष करती है, तो दूसरी तरफ यही सांप जंगल के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाता है. 2300 मीटर की ऊंचाई पर मिला घोंसला हो या पत्तियों से तैयार प्राकृतिक संरचना, किंग कोबरा की दुनिया आज भी शोधकर्ताओं के लिए कई सवालों और संभावनाओं से भरी है. जरूरत है इस दुर्लभ वन्यजीव को डर के बजाय वैज्ञानिक समझ और संरक्षण की नजर से देखने की.
हमारे अध्ययन में किंग कोबरा लेकर कई रोचक तथ्य सामने आए हैं. इनकी लाइफ स्टाइल तो चौंकाने वाली है ही, सबसे ज्यादा दिलचस्प मादा द्वारा अंडों की दो महीने तक भूखे-प्यासे रहकर रखवाली करना है. किंग कोबरा हमारे पर्यावरण संतुलन के लिए आवश्यक जीव है.
-संजीव चतुर्वेदी, निदेशक, एफटीआई-


